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- ऐसे सैकड़ों समाचार आप रोज़-ब-रोज़ अखबारों में पढ़ते होंगे, यह है “सेकुलर” समाचार बनाने की कला… जिसका दूसरा नाम है सच को छिपाने की कला… एक और नाम दिया जा सकता है, मूर्ख बनाने की कला। क्या आप इस समाचार को पढ़कर जान सकते हैं कि “दो गुट” का मतलब क्या है? किन दो ग्रामीणों की मौत हो गई है? पुलिस पर पथराव क्यों हुआ और डीएसपी रैंक का अधिकारी कैसे घायल हुआ? “बाहरी तत्व” का मतलब क्या है? स्कूल में छात्रों की पिटाई किस कारण से हुई? “शान्ति बैठक” का मतलब क्या है?… यह सब आप नहीं जान सकते, क्योंकि “सेकुलर मीडिया” नहीं चाहता कि आप ऐसा कुछ जानें, वह चाहता है कि जो वह आपको दिखाये-पढ़ाये-सुनाये उसे ही आप या तो सच मानें या उसकी मजबूरी हो तो वह इस प्रकार की “बनाई” हुई खबरें आपको परोसे, जिसे पढकर आप भूल जायें…
- लेकिन फ़िर असल में हुआ क्या था… पश्चिम बंगाल की “कमीनिस्ट” (सॉरी कम्युनिस्ट) सरकार ने खबर को दबाने की भरपूर कोशिश की, फ़िर भी सच सामने आ ही गया। जिन दो ग्रामीणों की धारदार हथियारों से हत्या हुई थी, उनके नाम हैं मानिक मंडल और गोपाल मंडल, जबकि सुमन्त मंडल नामक व्यक्ति अमताला अस्पताल में जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा है। त्रिमोहिनी गाँव के बाज़ार में जो दुकानें लूटी या जलाई गईं “संयोग से” वह सभी दुकानें हिन्दुओं की थीं। “एक और संयोग” यह कि दारपारा गाँव (झाउबोना तहसील) के जलाये गये 25 मकान भी हिन्दुओं के ही हैं।
झगड़े की मूल वजह है स्कूल में जबरन नमाज़ पढ़ने की कोशिश करना…
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