Monday, April 25, 2011

संघ ! स्वयंसेवक ! हिन्दू ! क्रांति ! विश्व और रोड मेप !!!!!!!!!!!

संघ ! स्वयंसेवक ! हिन्दू ! क्रांति ! विश्व और रोड मेप !!!!!!!!!!!: "
त्यागी

some caste specific references deleted here


"भारत राष्ट्र" एक बहुत ही पुरातन सोच है. पश्चिमी देशो की खींची लकीरों से बढ़ कर
है यह जिसको हम 'भारत राष्ट्र" कहेते है. परन्तु यह समझना उतना ही मुश्किल है जितना "हिन्दू धर्म" को समझना और जैसे की नासमझ, बेवकूफ और तथाकथित बुद्धिजीवी "हिन्दू धर्म" को अन्य धर्मो के समकक्ष मानकर उसी चश्मे से "हिन्दुओ" को परिभाषित करते आ रहे है. जो की निश्चित रूप से गलत है. असल में विश्व भर में हिन्दू जितना प्रीताडित है उतना कोई और या कोई कौम नहीं है. आज बड़े ही शुभ अवसर पर इसको विस्तार से समझते है की हिन्दू गुलाम क्यूँ है, क्यूँ बना और कैसे छुटकारा मिले. अभी गुलाम बोला तो कई आदमी इसी पर प्रशन चिन्ह लगा देंगे. मतलब आप आज भी क्यूँ गुलाम बोल रहे हो. मेरा मानना यह है की चाहे भारतवर्ष में कोई कितना भी धनाड्य हो वो भी असल में गुलाम ही है. अब वो कोई औद्योगिक घराना ही क्यूँ न हो जो हिंदुस्तान की जनता के "पैसे" को हमारे धुर विरोधी हॉवर्ड स्कूल को देता हो जो की भारत विरोधी अभियान चलाते है. यह हिंदुस्तान के गुलाम मानसिकता का ही परिचायक है.

परन्तु हर चीज की एक सीमा होती है उसी प्रकार संघ भी इस से अछुता नहीं है उसकी भी एक सीमा है. कुछ गंभीर प्रशन है जिन पर संघ को विचार करना होगा.

वैसे एक बात कहूँ की परम आदरनिये श्री मोहन भगवत जी ने इन प्रश्नों का उत्तर खोजने की शुरुवात कर भी दी है मुझे ऐसा प्रतीत होता है. परन्तु यह शुरुवात इन प्रश्नो के परिपेक्ष में हो तो 'परम वैभव' को पाया जा सकता है.

आज
संघ को स्थापित हुए ८५ वर्ष हो गए है परन्तु ऐसी क्या बात है की ८५ वर्षो में हमने वो नहीं पाया जिसको की हमे पा लेना चाहिए था. ऐसे कितने ही काल खंड आए जब संघ ने इन प्रश्नो को अनुतरित छोड़ दिया जबकि हम इतिहास बनाने के मुहाने पर थे. हम विगत के कुछ हिन्दू वीरो का जिक्र करते है जिन्होंने अपने जीवन काल में ही हिन्दुओ को "परम वैभव" का लक्ष्य दिलवा दिया था और वो लोग आधुनिक युग के ही है जैसे चाणक्य जी
, छत्रपति शिवाजी महाराज और उनका जीवन ८५ वर्ष का तो था ही नहीं जैसे की संघ का होगया और उनको भी हिन्दू को संघठित करने में दिक्कत आज से कुछ ज्यादा ही आई थी अब तो फिर भी संसाधन ज्यादा ही है, जब हिन्दुओ को इन महापुरुष अपने जीवनकाल में वहा पंहुचा दिया था तो संघ अब तक क्यूँ नहीं पंहुचा पाया. आज एक गाँधी (महात्मा गाँधी मात्र एक व्यक्ति) ने अपने जीवन काल में ही कोंग्रेस को ६० साल तक भारत जैसे देश की सत्ता का वारिस बनवा दिया तो संघ तो उस से बहुत बड़ी चीज है. तो फिर क्यूँ संघ ही कुछ नहीं बन पाया और न ही कोई वारिस पैदा कर पाया?
  • एक जयप्रकाश नारायण देश में क्रांति कर सकता है और संघ को उनका समर्थन करना पड़ता है और आज संघ से प्रेरित उसकी राजनेतिक शाखा (बीजेपी - संघ से प्रभावित अलग संघठन) को उनका और उनके अनुयाइयो (नितीश कुमार) का साथ देना पड़ रहा है. इसका अर्थ या तो यह है की व्यक्ति के आगे संघठन छोटा होता है या फिर डॉ. हेडगेवार जी का सिधान्त ही गलत था की उन्होंने भगवा ध्वज को गुरु बनाया ना की स्वयं अपने को और थोप देते हिन्दुओ और देश पर अपने ही परिवार का कोई वारिस या फिर हेडगेवार जी के बाद के संघचालक ही उनके लक्ष्य को समझने में और पूरा करने में असमर्थ रहे. मुद्दा यह है की देश में एक गाँधी क्रांति कर सकता है, एक जयप्रकाश क्रांति कर सकता है तो ८५ साल का संघ क्यूँ नहीं अब ८५ साल का कालखंड कोई छोटा कालखंड तो है नहीं, मैं अपनी छोटी से समझ से यह मानता हूँ की कहीं ना कहीं रणनीति में कोई त्रुटी है. और मेरे अनुसार त्रुटी यह है की "समाज सत्ता से बन रहा है ना की समाज से सत्ता" इस सिदान्त का ना मानना है ही संघ की सबसे बड़ी भूल है. क्योंकि हिन्दुओ को आज के समय संघटित करना 'मेंडेको को तोलने" के समान है (क्षमा करे इस तुलना के लिए) इसका कारण है १२०० साल से हिन्दू ऑक्सीजन पर जी रहा है. उसको विश्वाश ही नहीं होता की उसकी विरासत सतयुग, त्रेता और द्वापर में स्वर्णिम थी. उसने तो कुत्ते और बिल्ली से जीवन को ही अंगीकार कर लिया. कुछ भी कर लो इन को सत्ता ही की भाषा समझ में आती है फिर वो तुर्क हो, मुग़ल हो, अंग्रेज हो या फिर गाँधी की कोंग्रेस हो उन्ही की बात इनको समझ आती है. तो फिर संघ सत्ता पर क्यूँ दावा नहीं ठोकता और हिन्दू को सबल बनाने का बीड़ा उठता ? बहुत हो चूका समाज जोड़ने का प्रयास (क्यूंकि बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है), इस प्रयास में ही खोट है (क्यूंकि ८५ साल में भी लक्ष्य नहीं पा पाए). ऐसा क्या है की एक मायावती जिस पर सभी दलित फ़िदा है, और क्यां हम नहीं जानते की संघ ने अपने सर्वोतम प्रयासों के बावजूद वो नहीं पाया जो लगाव दलितों का मायावती ने पाया. मैं तो समझता हूँ फिर दो चार मायावती ही संघ पैदा कर दे.


इस लिए मेरा मानना है की संघ सत्ता हांसिल करे (प्रथम) फिर उसे उसके ८५ साल के बनाये संघठन का भी लाभ मिलेगा. वो पुरषार्थ व्यर्थ नहीं है क्यूंकि संघ जितना करता नहीं उतना तो यहाँ बिगाड़ने वाले है और फिर वही के वही सिफ़र (शून्य) है. संघ इस बात को जितना शीघ्र समझ लेगा उतना ही जल्दी हिन्दुओ और देश का भला होगा. क्या हम नहीं जानते संघ के सामने ही सामने डॉ. आंबेडकर ने हिन्दू धर्म छोड़ दिया था. क्यूँ संघ ने प्रयास नहीं किया उनको हिन्दू धर्म में रखने का. ऐसे कई प्रशन के उत्तर संघ को ही देने होंगे. कोई भारत के राष्ट्रपति या कांग्रेस से नहीं पूछेगा. क्यूंकि अग्नि परीक्षा सीता ही देती है तुच्छ प्राणी तो उसकी सोच भी नहीं सकते.
  • दूसरा बड़ा ही आलोचनात्मक रुख लेकर मुझे कहेना होगा की जो टीवी पर अपने को संघ का स्वयम सेवक बताते फिरते है उनके बच्चे संघ से विमुख क्यूँ है? गंभीर प्रशन है मित्रो, एक स्वर्गीय सज्जन जो की बीजेपी के बड़े नेता भी रहे है. वो जब संघ में दीक्षित थे और उनके विचारो से लाखो प्रभावित भी होंगे तो उनके खुद का पुत्र क्यूँ नहीं. यह ढोंग नहीं तो क्या है की आप दुनिया भर में बात तो शुचिता और नैतिकता की करते हो परन्तु अपने स्वयं के पुत्र उसके ठीक विपरीत है.

  • अब आते है राजनेतिक पक्ष पर बिना किसी लाग लपेट के है की बीजेपी जब संघ को अपना सर्जनकर्ता मानती है तो बिहार में अपनी भद्द क्यूँ पीटवा रही है. नितीश के सामने सारी बीजेपी शीर्षासन क्यूँ कर रही है? और लालू को हटाना इतना ही बड़ा एजेंडा है तो पिछले पांच साल में बिहार में बीजेपी ने अपने कौन से एजेंडे सरकार से लागू करवा लिए है ? याद रखना बीजेपी को नितीश के रूप में एक बहुत ही बड़ा झटका लगेगा. अरे बीजेपी विपक्ष में होकर भी अपने मुद्दे नितीश से नहीं मनवा पाई (राष्टीय मुद्दे) तो सत्ता में आकार कैसे कर पायेगी अब (केंद्र में) तो खोने को भी कुछ नहीं है तो फिर अपने तपे तपाये स्वयंसेवको को बीजेपी में भेज कर क्या ले रहे हो ? जब स्वयम सेवक को बीजेपी में मंत्री बन कर कुर्सी ही गर्म करनी है तो संघ क्यूँ बदनाम हो इनके कर्मो और कुकर्मो से ? आज बीजेपी लोकसभा के दो लगातार चुनाव हारने के बाद भी अपने राजग के घटक दलों को अपने (हिंदुत्व और राष्ट्रवादी) मुद्दों के बारे में समझा नहीं पाई तो एक बार फिर सत्ता में आने के बाद क्या कर लेगी? अभी तो कुछ खोने को भी नहीं और समय भी बहुत है. या फिर से ममता, समता और जयललिता वाला खेल खेलना है ?

  • और यदि संघ भी यह सोचता है की सत्ता लेने के बाद भी अपने मुद्दों को बीजेपी से लागू नहीं करवाया जा सकता है तो फिर अभी इस पर विचार करना होगा. आजादी से पहेल गाँधी से भी लोगो को उम्मीद थी. जिस उम्मीद पर उसने आम हिन्दू को बरगला रखा था "राम राज्य" और फिर सत्ता का अंग्रेजो के हाथ से काले अंग्रेजो के हाथ में आकर उसका तकनिकी हस्तांतरण मात्र ही हो पाया वास्तविक नहीं. इसी प्रकार आज की बीजेपी भी वो ही कर रही है श्री राम मंदिर मुद्दा छोड़ दिया, धारा ३७० छोड़ डी (क्यूंकि केंद्र में बीजेपी ने कुछ नहीं किया अटल जी के समय में) और जो बीजेपी वाले संघ को कहेते है की सत्ता मिलने के बाद करेंगे वो भी संघ का प्रयोग मात्र कर रहे है. अरे आज क्यूँ नहीं अपने घटक दलों को संघ के वास्तविक मुद्दों पर मनाते, समझाते, केंद्र की सत्ता में थे तो यह चिंता थी की सत्ता ना चली जाये, अब अपनी छवि की चिंता क्यूँ करते फिर रहे हो? बिहार में तो संघ के स्वयमसेवक ( श्री नरेंद्र मोदी जी) और हिन्दू वीर वरुण जी का अपमान बल्कि घोर अपमान किया जा रहा है.
  • मेरी समझ में नहीं आता की संघ अपने दुश्मनों के सामने चरित्र (सात्विक) के मामले पर इतना रक्षात्मक रुख क्यूँ रखता है. यह मैं इसलिए कह रहा हूँ जब राहुल गाँधी जैसे दो पैसे की बुद्धि वाले भी संघ पर आरोप लगाने के कुव्वत रखते है. जिनका कोई ना ईमान है और ना ही कोई चरित्र. अरे जब "संघ के दुश्मनों" का चरित्र ही नहीं तो वो चरित्र की बात किस आधार पर करते है. व्यक्तिगत चरित्र एक अलग चीज है उस से राजनीती का कोई भी फायदा नहीं (यदि है तो बोनस है). अरे परम वीर हिन्दू ह्र्दय सम्राट आदरनिये श्री बाल ठाकरे जी से ही सीख लो जूते की नोक पर रखते है अपने विरोधियो को और संघ भी जान ले की यदि हमारा दुश्मन हमारी नेतिकता और इमानदारी को हमारे ही विरुद्ध हथियार बनाता है तो एक मिनट भी नहीं लगनी चाहिए उसको छोड़ने में. ऐसी नीति पर नहीं चलता तो बड़े लक्ष्य की राह में ऐसे ही रोड़े आते रहेंगे फिर ८५ साल नहीं १८५ साल में भी हम हिन्दू हितो की रक्षा नहीं कर पाएंगे जैसे की हम विगत में नहीं कर पाए. फालतू की झूटी शान और वीरता के ढोंग ने मुग़ल काल में हमारे पता नहीं कितने हिन्दू वीर "युद्ध में पीछे न हटने की" और "पीठ न दिखाने" की मुर्ख सोच से समूल हिन्दू जाति को गुलाम बना बैठे. एक शिवाजी ने इसकी तोड़ निकाली और मुगलों की ईट से ईंट बजा दी. हिन्दू राजाओ को मालूम ही नहीं था की समय की नजाकत देख कर पीछे लौटना भी "समझदारी" है. परन्तु हिन्दू न तो वर्तमान से सबक लेते और न ही भूतकाल से. और मुर्खता की परकाष्ठा यह है की पूर्व में भगवान् श्री कृष्ण के जीवन से भी सबक लेने को हिन्दू तैयार नहीं है. श्री कृष्ण को "रणछोड़" भी कहेते है. उन्होंने भी एक समय, वक्त की नजाकत देखते हुए रण छोड़ दिया था, क्यूंकि उनको भी मालूम था जिस कार्य के लिए उन्होंने अवतार लिया है "अधर्म से मुक्ति" वो उनका लक्ष्य है फ़ालतू के कार्य के लिए अपने प्राण गवाना नहीं.

  • आज संघ भी है और उसके प्रखर राष्ट्रावादी स्वयंसेवक भी तो क्या उन्होंने कश्मीरी पंडितो की रक्षा कर ली और यदि वो नहीं आज कर पा रहे है तो विश्व के इतने बड़े संघठन का क्या आचार डालेंगे ? (क्षमा करे आक्रोशित होने के लिए) या फिर भगवान् कल्कि का ही इन्तजार करना है तो फिर यह संघठन - संघठन क्यूँ खेला जा रहा है. बंद करो इसे और राम भजो. जब एक स्वयं सेवक श्री रवि शंकर प्रसाद (राम जन्मभूमि पक्ष के वकील) ही न्याय दिला सकते है तो फिर इतने बड़े अभियान का क्या ? सत्ता से सरकार है, सरकार से न्यायालय है और इन न्यायालयों से देश के नागरिको के घेरेलु मुद्दे सुलझाये जाते है देश (हिन्दू) की अस्मिता और संप्रभुता के नहीं. और जो ऐसा सोच रहे है वो गफलत में है विरोधी पक्ष इतना कमजोर नहीं जितना सोचा जा रहा है.

  • संघ को सबसे पहेले आपने मुख पत्र पर ध्यान देना होगा. पांचजन्य की सर्कुलेशन बहुत गिर चुकी है, दूसरा एक श्री राम स्वरूप जी, मुज़फ्फर हुसैन जी को छोड़ कर कोई खास विचारक लेख भी नहीं होता, खाली इधर उधर की खबरे ही होती है. दूसरा न तो इसको आप शिवसेना के "सामना" की तरह सन्देश वाहक और बाला साहेब के मुखपत्र की तरह इस्तेमाल करते और न ही किसी कोमेर्शिअल पेपर की तरह इसकी पाठक संख्या बढाने के उपाए करते. भाई मानना पड़ेगा तरुण विजय जी के जाने के बाद पांचजन्य की आक्रामकता तो बिलकुल ही ख़त्म होगई. एक अच्छा प्रयास है साधना टीवी के माध्यम से जनता तक अपना सन्देश पहुचाने का परन्तु आप शायद जानते नहीं कांग्रेसी राज में इस चैनल को महत्वपूर्ण समय पर ब्लाक कर दिया जाता है. दूसरा टीवी मीडिया में पूरा का पूरा एक कांग्रेसी-वामपंथी - इसाई गैंग है उसका मुकाबला संघ के लिए अभी संभव ही नहीं. सो प्रिंट मीडिया पर ध्यान दिया जाये. हाँ इन्टरनेट पर संघ के स्वयमसेवक बहुत मुखर है. यह एक संतुष्टि वाली बात है. पांचजन्य को दोबारा से खड़ा करना एक भागीरथी प्रयास होगा और हमे आशा है यह किया भी जायेगा.

  • संघ अब हिन्दू आतंकवाद जो की एक साजिश के तहत गढा गया शब्द है पर भी रक्षात्मक हो जाता है. मेरी समझ में नहीं आता की क्या कर्नल पुरोहित के सेना में बड़े पद पर काम करने से सेना आतंकवादी होगई ? क्या सेना कही पर भी सफाई देती फिरती है ? और कर्नल पुरोहित का तो संघ से सीधे कोई संबध भी नहीं था. तो मुझे समझ नहीं आता जब सेना कसूरवार नहीं जब की वह वहां एक अधिकारी थे. तो संघ कैसे जिम्मेदार होगया. यही साध्वी प्रज्ञा के बारे में है और अपने ऊपर आरोप लगते देख संघ ही इसमें रक्षात्मक होगया. संघ को साफ़ करना चाहिए कल ही कांग्रेस का एक विधायक आतंकवादी को शरण देने के लिए बंगाल पकड़ा गया है तो क्या सोनिया गाँधी ने कोई बयान जारी कर दिया? या कोई माफ़ी मांग ली ? क्यां दन्त दिखाऊ कांग्रेस नेता आतंकवादी हो गए? नहीं. अरे जो कानून को लगता है गलत है उसको फांसी चढाओ मेरा इसमें साफ़ मानना है. इनके इस देश के कानून से जो लोग खिलवाड़ कर रहे है वो ५-५ साल से फांसी की सजा पाए अफजल गुरु को तो फांसी पर लटका नहीं पाए. असम का कांग्रेस का एक सांसद कितना बड़ा देशद्रोही है सब जानते है परन्तु क्या कांग्रेस रक्षात्मक है ? नहीं है!

  • सारी बीजेपी नीतिश के साथ धर्मनिरपेक्षता का तमगा लेने के लिए खड़ी है और वो भीगो - भीगो कर जुते मार रहा है. और जूते खा कौन रहा है जो स्वयम "छदम धर्मनिरपेक्षता" शब्द के अविष्कारक है. अरे हमारा मौलिक विचार है की "हिन्दू धर्म खुद में एक धर्मनिरपेक्ष" है तो दिक्कत क्या है ? मेहनत ही तो ज्यादा करनी पड़ेगी. चतुर बुद्धि से उसको भी करो और समझा दो की हम हिन्दू है और हमारे डी.एन.ऐ में ही धर्मनिरपेक्षता है.

Binayak Sen gets Korean prize for Chrisist activism

Binayak Sen gets Korean prize for Chrisist activism: "The anti-national Christist terror mastermind has become something of a celebrity overnight for assorted seditionists. The brazenness of this thug is astounding. He made a sly declaration after his release that he 'loved' his country and that 'patriotism' needs to be redefined!!

The Union Law minister, Veerappa Oily also declared with alacrity that the entire legal framework pertinent to sedition needs re-evaluation, in light of the manipulated judicial verdict exonerating the poster boy of 'CIVIL SOCIETY'!!!

The confidence of 'Binayak' Sen, Susan 'Arundhati' Roy et al is not surprising, given that the global church has thrown its weight behind them.

The christist neo-converts in South Korea have gleefully announced a prize for their agent in India. Read this note in the TOIlet paper carefully. The Korean prize was instituted in 2000, the year Christist Pope John Paul declared, on Indian soil - his intent to plant the cross in Asia and bring the continent under the church's dominion.

The very first recipient of the award - a Christist 'CIVIL SOCIETY' activist in Indonesia, who was instrumental in carving out a new Christian country in the new millenium - East Timor was 'liberated' for Christ with Western aid.

There are have also been murmurs about the second awardee, Aung San Suu Kyi of
Burma and her Western/Christist links.


http://m.timesofindia.com/india/Binayak-Sen-gets-South-Korean-human-rights-prize/articleshow/8057703.cms


Binayak Sen gets Korean human prize for Christian activism
Apr 22, 2011, 05.18pm IST PTI

NEW DELHI: Civil rights activist Binayak Sen, recently freed on bail by the Supreme Court in a sedition case, has been honoured with the 2011 Gwangju Prize for Human Rights, South Korea's most prestigious award for those working on peace, democracy and justice in Asia.

The award was announced yesterday by 2011 Gwangju Prize Committee in Seoul.

The prize, which carries a sum of USD 50,000 is awarded each year on May 18 -- on the anniversary of the May 1980 Gwangju democratic uprising -- to a person or organisation who has made significant contributions in the field of human rights and democracy.

'Dr Sen, as an accomplished medical practitioner has distinguished himself by his devotion to providing health services for the poor and by his strong advocacy against human rights violations and structural violence inflicted on the poor,' the award jury said in a statement on the website of May 18 Memorial Foundation.

'He has also been active in the People's Union for Civil Liberties documenting human rights violations occurring during the anti-Naxalite conflict,' it said.

The jury this year received 32 nominations from countries all around Asia. Xanana Gusmao, the leader of the East Timore struggle for independence was the first awardee of the Gwangju Prize when it was launched in 2000, while Burmese pro-democracy leader Aung San Suu Kyi won it in 2004. Irom Sharmila, the Manipuri human rights activist, is the previous Indian winner of the Gwangju Prize.

इस्लाम धर्म नहीं एक पंथ है !!!!!!

इस्लाम धर्म नहीं एक पंथ है !!!!!!: "
संस्कृत के जाने-माने विद्वान डॉ. हनीफ शास्त्री भगवद्गीता के मुरीद हैं। उन्होंने इसके सात सौ श्लोकों का हिंदी में अनुवाद किया है। संस्कृत में अनेक किताबें लिखने वाले डॉ. शास्त्री ने अफगानिस्तान में भी संस्कृत पढ़ाई है। इसके लिए उन्हें तालिबानियों का विरोध झेलना पड़ा, लेकिन शास्त्री जी ने उन्हें राजी कर लिया।

संस्कृत जैसी कठिन भाषा से आपका जुड़ाव कैसे हुआ? संस्कृत बचपन से ही पढ़ने में अच्छी लगती थी। नौवीं तक तो ऐसे ही पढ़ा, फिर लगा कि आदर्श, परोपकार और सदाचार की जो बातें संस्कृत के माध्यम से मिलती हैं, वे और कहीं नहीं मिलतीं। तभी से यह बात दिमाग में आई कि भारतीयता को समझने के लिए संस्कृत का विशद् अध्ययन बहुत जरूरी है। हम जिस देश में रहते हैं, जिस देश का अन्न जल ग्रहण करते हैं उसके प्रति हमें वफादार रहना चाहिए। यह जरूरी है कि हम अपने देश की संस्कृति को समझें, धर्म और धार्मिक परंपराओं को समझें और मूल धार्मिक ग्रंथों को जानकर उनका अध्ययन करके समाज में उनका प्रचार-प्रसार करें। लोग संस्कृत को कठिन इसलिए समझते हैं क्योंकि उनमें जिज्ञासा की कमी है। किसी भी कार्य के प्रति बलवती जिज्ञासा होगी तो वह कार्य कठिन नहीं लगेगा। मुझमें जिज्ञासा थी इसलिए संस्कृत मुझे कठिन नहीं लगी।

क्या भगवद्गीता को आज के संदर्भ में प्रासंगिक मानते हैं? मेरी जेब में तो छोटे आकार की भगवद्गीता हमेशा रहती है। इसे ताबीज गीता भी बोला जाता है। है तो यह छोटा-सा ग्रंथ पर इसमें सभी धर्मों का सार आ गया है। मैंने पाया कि इस्लाम के जो पांचों स्तंभ हैं वह सबके सब भगवद्गीता में मौजूद हैं। जैसे पहले स्तंभ इस्लाम का अर्थ है समर्पण, वैसे ही गीता में भी ईश्वर के प्रति समर्पण की बात नौंवे अध्याय में आती है। दूसरा स्तंभ एकेश्वरवाद भी दोनों का एक जैसा है। तीसरा रोजा या निराहार रहने की बात दोनों में है। चौथा नमाज या ईश्वर स्मरण और पांचवां दान या जकात पर भी दोनों की शिक्षाएं एक-सी हैं। मैं समझता हूं कि भारतीय चरित्र के उत्थान में भगवद्गीता की अहम भूमिका है। दुनिया के महानतम ग्रंथों में इसकी गिनती होती है। गीता का ज्ञान हर भारतवासी के लिए अनिवार्य होना चाहिए। गीता के ज्ञान की आज भी वही प्रासंगिकता है जो हजारों साल पहले थी।

संस्कृत सीखने और उसमें काम करने पर आपके समुदाय की क्या प्रतिक्रिया रही है? कभी आपको अपने समुदाय का विरोध तो नहीं झेलना पड़ा? मेरी वजह से मेरे समुदाय के बहुत-से लोग भी संस्कृत सीखने लगे हैं। मुझे काबुल विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए भेजा गया था। वहां का सिलेबस भी मैंने ही तैयार किया है। वहां अब भी संस्कृत पढ़ाई जा रही है। कुछ तालिबानियों ने वहां आपत्ति की थी कि मुसलमानों को संस्कृत नहीं पढ़ाई जानी चाहिए। मैंने उनको कहा कि दुनिया में संस्कृत कोई और पढ़े या न पढ़े पर मुसलमानों को संस्कृत जरूर पढ़नी चाहिए क्योंकि इस्लाम की सारी बुनियादी बातें वेद, उपनिषद, गीता और पुराणों में मौजूद हैं। इन्हें पढ़ने और समझने के बाद अपने आप आपके ईमान में पुख्तगी आती है। उन्हें कई उदाहरण देकर मैंने समझाया जिससे वे खुश हुए और अपनी इजाजत ही नहीं दी बल्कि उन्होंने मेरी पूरी सुरक्षा का वादा भी किया। यहां भारत में भी जमाते-इस्लामी-हिंद मुझे जगह-जगह मुस्लिम समाज में लेक्चर देने के लिए बुलाता है। मुझसे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कुरान की मूल बातें संस्कृत ग्रंथों में किस रूप में हैं। पैगम्बर मोहम्मद साहब की पैदाइश की भविष्यवाणी पुराणों में पहले से मौजूद है जिसे जानने की जिज्ञासा लोगों में बेपनाह रहती है। हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों से मुझे बहुत मोहब्बत मिलती है। न ही कभी किसी ने धमकी दी न ही मुझे कभी डर लगा।

आज सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने में आप अपनी या अपने जैसों की क्या भूमिका देखते हैं? मेरा तो मानना है कि सांप्रदायिक सद्भाव रखने में भी गीता ही मददगार है। कुछ लोग संस्कृत को पुरातन ज्ञान मानते हैं पर यह ठीक नहीं है। इसमें प्राचीन और अर्वाचीन दोनों परंपराओं को जोड़कर रखने की क्षमता है। आज के जीवन मूल्यों में भी इसके सिद्धांत लागू होते हैं। हालांकि कुछ लोगों ने संस्कृत के प्रति एकाधिकार समझकर इसे व्यापार बना दिया है। वे इसका महत्व धूमिल करने में लगे हैं इसलिए संस्कृत का प्रचार-प्रसार तीव्र गति से नहीं हो पा रहा।

आप किसी सरकारी संस्थान से भी जुड़े हुए हैं? मैं भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान से जुड़ा हुआ हूं जिसे मानित या डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल है। वहां मैं शोध सहायक हूं। पर 29 साल पहले जिस पोस्ट पर नियुक्त हुआ था, अब उसी से रिटायर होने वाला हूं। मुझे आज तक कोई प्रमोशन नहीं दिया गया। इसका खासा मलाल है। दुनिया में संस्कृत कोई और पढ़े या न पढ़े पर मुसलमानों को संस्कृत जरूर पढ़नी चाहिए क्योंकि इस्लाम की सारी बुनियादी बातें वेद, उपनिषद, गीता और पुराणों में मौजूद हैं

सौ. नवभारत टाइम्स
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मित्रो आप नहीं समझते की इस्लाम भी एक पंथ है जैसे की इसाई एक पंथ है ? अब जब हनीफ शास्त्री जी ने भी स्पष्ट कर दिया जो स्वयं मोहमदी पंथ (इस्लाम पंथ) के अनुयाई है की हिन्दू धर्म के अन्दर ही इस्लाम भी व्याप्त है. और उसमे जो भी विभ्याचार, हिंसा और द्वेष है असल में उसकी वो कुरूतिय है जो शिक्षा के आभाव में आगई, धर्म यदि कोई है इस पृथ्वी पर वो तो केवल हिन्दू धर्म है (जिसको मानव धर्म भी कहा जाता है) बाकि सभी पंथ है.

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India offers to sell cheap electricity to Pakistan

India offers to sell cheap electricity to Pakistan: "Islamabad: At a time when Pakistan is facing acute shortage of electricity, India has offered to sell power at cheap rates to its energy-starved neighbour, Commerce Secretary Zafar Mehmood said today."

कार्टून: इसको यहाँ भी चाहिए रिजर्वेशन.

कार्टून: इसको यहाँ भी चाहिए रिजर्वेशन.: "mayawati Cartoon, bsp cartoon, Reservation cartoon, indian political cartoon, corruption in india, corruption cartoon
Cartoon by Kirtish Bhatt (www.bamulahija.com)
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