Friday, November 27, 2009

जहा कभी आसरा मिला अब वहीं हो गए बेगाने

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    • गोपालगंज
    • भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान [अब बाग्लादेश] में साप्रदायिक हिंसा और र्दुव्यवहार झेलने वाले जिन तीन सौ बंगाली हिंदू शरणार्थी परिवारों को भारत की नागरिकता देकर जिला मुख्यालय से 38 किलोमीटर दूर श्रीपुर में बसाया गया था, वे अब अपनों के बीच बेगाने हैं। 46 वर्ष बाद भी इनके साथ सामान्य सलूक नहीं किया जाता। उनको मिली जमीन पर दबंगों का कब्जा है। वे धर्म, जाति और भाषा के आधार पर राज्य में किसी का सुनिश्चित थोक वोट नहीं बन पाये हैं, इसलिए कोई उनका पुरसाहाल नहीं है।

      दूसरी तरफ इसी राज्य के सीमावर्ती जिलों में बड़ी संख्या में घुसपैठ कर आने वाले बाग्लादेशी किसी न किसी तरह नागरिकता प्राप्त कर स्थानीय आबादी के लिए न सिर्फ मुसीबत बन गए हैं, बल्कि राजनीति को भी प्रभावित कर रहे हैं। श्रीपुर में बसाये गए लोगों की आजीविका का मुख्य साधन सरकार से मिली थोड़ी सी जमीन पर खेती और मजदूरी है।

    • ये लोग सरकार की पहले से मिली जमीन पर झोपड़ी बनाकर आसपास के लोगों के साथ घुल मिलकर रहने लगे। परंतु आज सरकारी सुविधा के अभाव में इनके सामने विकट समस्या खड़ी हो गयी है। हद तो यह कि इन्हें नागरिकता मिलने के बाद भी बाग्लादेशी शरणार्थी कहा जाता है।

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