Friday, December 4, 2009

धर्मनगरी में उठे विरोधी स्वर

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    • शंख बिक्री पर पाबंदी लगाने पर धर्मनगरी में विरोध के स्वर बुलंद होने लगे हैं। धार्मिक संगठनों और संतों ने इस पाबंदी को सीधे हिंदू संस्कृति पर प्रहार करार दिया है।

      साधु संतों व संगठनों का कहना है कि यदि जल्द ही यह पाबंदी खत्म नहीं की गई तो वे सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करेंगे। लोगों में जहां इस बात को लेकर रोष है, वहीं दुविधा भी बरकरार है। क्योंकि अभी तक अधिकांश लोगों को यही पता नहीं था कि इस पर कोई पाबंदी भी है। खास बात यह है कि वन्य प्राणी सरंक्षण एक्ट में उक्त पाबंदी काफी सालों से है। वन्य प्राणी विभाग द्वारा कुछ दिन पूर्व की गई कार्रवाई से इसका पता चला।
    • श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के अध्यक्ष जयनारायण शर्मा का कहना है कि वन्य जीव जंतु विभाग की ओर से शंख बेचने पर पाबंदी लगाना हिंदू संस्कृति के खिलाफ एक सोचा समझा षड्यंत्र है। शंख सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है। महाभारत युग में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं शंखनाद किया था। वेद व पुराण और अन्य धार्मिक गं्रथों में शंख को जीव नहीं माना गया है और हर मांगलिक कार्य शुरू करने से पूर्व शंखनाद करने की परंपरा है।
    • वन्य प्राणी विभाग के निरीक्षक रामकरण शर्मा का कहना है कि वन्य प्राणी सरंक्षण अधिनियम 1972 के तहत शंख बेचने पर पाबंदी है। शंख का निर्माण जीव से होता है, ऐसे में इसे जीव हत्या माना गया है और इसकी इजाजत कानून नहीं देता। विभाग ने नियमानुसार ही उक्त कार्रवाई की थी।

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