Tuesday, December 22, 2009

Our gods have three feet: Jairam Ramesh | Top News

  • tags: no_tag

    Jairam-Ramesh
    • Environment Minister Jairam Ramesh borrowed a leaf from Hindu mythology while defending the government's stand at the Copenhagen climate summit, saying like "(some) gods have three feet", India was with the G-77, the BASIC group and the industrialised nations.

      "We're in the G77 and in the BASIC group and in talks with industrialised countries. Many of our gods have three feet. We should do the same," Ramesh quipped at a press conference when asked to comment on reported unhappiness among members of the Group of 77 countries at India's stand in Copenhagen.

      He then added as further illustration: "We should be like Nataraj (Hindu deity who performs dance of destruction). Doesn't he have four feet(sic)?"


Posted from Diigo. The rest of my favorite links are here.

visfot.com । विस्फोट.कॉम - गढ़ तो चढ़ गये गड़करी लेकिन...

  • tags: no_tag

    • प्रेम शुक्ल
    image
    • गडकरी निश्चित तौर पर महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग में क्रांतिकारी परिवर्तन करने में कामयाब हुए थे। उन्होंने विदर्भ में भाजपा के विस्तार की कमान भी संभाले रखी। लेकिन पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल में वे महाराष्ट्र में भाजपा को पुनर्संगठित करने में कामयाब नहीं हुए। महाराष्ट्र में भाजपा को सफलता दिलाने में उन्हें किसी प्रकार की बाधा नहीं थी। क्या राष्ट्रीय स्तर पर वही गडकरी भाजपा को नए सिरे से सुसंगठित करने में कामयाब हो पाएंगे?
    • क्या भाजपा में अध्यक्ष सर्वशक्तिमान व्यक्ति होता है? अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के अलावा पिछले 29 वर्षों में भाजपा का कोई भी अध्यक्ष सर्वोच्च नेता की हैसियत को नहीं पा सका है? वाजपेयी और आडवाणी के बाद पहली बार अध्यक्ष की कुर्सी पानेवाले मुरली मनोहर जोशी वरिष्ठता, अनुभव, वक्तृत्व, विद्वता आदि मापदंडों पर सुषमा स्वराज या अरूण जेटली की तुलना में बहुत आगे हैं। फिर मुरली मनोहर जोशी को वाजपेयी और आडवाणी के बाद पार्टी में कभी तीसरे क्रमांक का भी व्यक्ति क्यों नहीं बनाया गया?
    • राजनाथ सिंह की विदाई इस अंदाज में की गई है मानो वे भाजपा के सबसे विफलतम अध्यक्ष रहे हों। जबकि सच्चाई यह है कि राजनाथ सिंह के नेतृत्व में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में पार्टी को सफलता हासिल हुई। यदि केंद्र में सरकार न बनाने की विफलता राजनाथ सिंह के खाते में दर्ज होती है तो राज्यों की सफलता भी उनके खातों में क्यों नहीं दर्ज की जाती?
    • पार्टी विरोधी कार्रवाइयों को जब अध्यक्ष के खिलाफ शीर्ष नेतृत्व हवा दे रहा हो तो क्यों कोई अध्यक्ष पार्टी को सफलता दिला सकता है? फिर राजनाथ सिंह से सफलता की उम्मीद किस खातिर?
    • भाजपा का उदय सांगठिनक क्षमता की बजाय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के अल्पसंख्यकवाद की प्रतिक्रिया के चलते हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा के सबसे अधिक प्रभावोत्पादक नेता रहे। वे 1980 से 1986 तक भाजपा के अध्यक्ष थे। इस काल में भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालनेवाली शक्ति नहीं बन पाई थी। लालाकृष्ण आडवाणी का पहला कार्यकाल भी भाजपा को विपक्ष की सशक्ततम पार्टी नहीं बना पाया था। भाजपा जिस आंदोलन के चलते सत्ता के समीकरण में अपरिहार्य बनी, वह उसका अपना आंदोलन होने की बजाय विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन था। भाजपा का राष्ट्रीय विकास 1989 से 1996 के बीच हुआ। इन सात वर्षों में तीन वर्ष मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष रहे। उन्होंने भी आडवाणी की तरह राष्ट्रीय स्तर पर रथयात्रा की। वे कश्मीर के लाल चैक तक भाजपा का रथ लेकर गए। बावजूद इसके जब कोई भाजपाई आडवाणी और जोशी की तुलना करता है तो वह जोशी को कभी आडवाणी की बराबरी का सम्मान नहीं देता, क्यों? भाजपा सत्ता में आते ही राम जन्मभूमि, धारा 370, समान नागरिक संहिता जैसे अपने मूलभूत मुद्वों को किनारे कर बैठी।

Posted from Diigo. The rest of my favorite links are here.

भ्रांतिरू पेण संस्थिता

  • tags: no_tag

    • देश का राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। लोकतंत्र का स्वरू प छिन्न-भिन्न होता दिखाई पड़ रहा है। जनता को जिस प्रतिपक्ष से अधिक अपेक्षाएं रहती हैं, वही भाजपा आत्महत्या के मार्ग पर मुड़ती दिखाई पड़ रही है।
      जिस प्रकार नए अध्यक्ष का चुनाव किया गया।

      जिस प्रकार संघ ने कह दिया कि आगे स्वयं गडकरी जानें।
      जिस प्रकार सभी दिग्गजों ने अपनी-अपनी कुर्सियां हथिया लीं और संसदीय बोर्ड मूकदर्शक बना बैठा रहा।
      जिस प्रकार कुर्सी से उतरते ही राजनाथ सिंह कह पड़े कि "बड़े नेता के दबाव और दखल के कारण उनके निर्णय लागू नहीं हो पाए, यह परम्परा अच्छी नहीं है।"

      जिस प्रकार प्रदेश अध्यक्ष की हैसियत से तीन-तीन चुनाव हारने पर भी गडकरी को अध्यक्ष बनाया गया।
      जिस प्रकार संसदीय दल के अध्यक्ष का पद सृजित करके आडवाणी ने स्वयं को भीष्म पितामह की तरह इच्छा-मृत्यु का अधिकारी साबित करने का प्रयास किया है।
    • लगता यही है कि आने वाले समय में संघ की अनिर्णय की भूमिका ही भाजपा की दुर्गति का कारण बनेगी। आरक्षण ही की तरह संघ/ गैर संघ की लड़ाई बड़ी होती जाएगी, भाजपा छोटी होती जाएगी।
    • गुलाब कोठारी

Posted from Diigo. The rest of my favorite links are here.

सबसे शर्मनाक दिन

  • tags: no_tag

    • स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे शर्मनाक दिन कौन-सा है? क्या 6 दिसंबर, 1992 का वह दिन, जब अयोध्या स्थित विवादास्पद ढाचा ध्वस्त हुआ या फिर 16 मार्च, 2006 को होली की छुट्टी का वह दिन, जब केरल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर साठ निरपराधों की हत्या के आरोपी आतंकवादी की रिहाई के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया? केरल के सेकुलरिस्टों ने उक्त आरोपित आतंकवादी को जेल में न केवल पंचसितारा सुविधाएं उपलब्ध करवाईं, बल्कि उसकी रिहाई के लिए विधायिका का दुरुपयोग भी किया।
    • [बलबीर पुंज : लेखक भाजपा के राज्यसभा सासद हैं]

Posted from Diigo. The rest of my favorite links are here.

The Grand Asymmetry: The Swiss Minaret Ban

  • tags: no_tag

    • The minaret that triggered the ban overwhelms the local landscape
    • Terrified bleeding passenger after attack on bus at Agra after Saddam execution
    •  
    • Let's try to put this in context, as Suzanna Genocide Roy always exhorts us to do. Now Switzerland is a neutral country, always was. It stayed neutral in WW I, WW II and characteristically it remained neutral in the Iraq war. In other words, if there is one country the "occupation" theory does not apply to, it is the region of Europe we proudly claim Kashmir is similar to.
    • Swiss minorities started radicalizing and started creating the same sort of issues that we see everywhere. The recent imports from more radical countries started becoming more assertive. The minaret that triggered the ban (pictured above) was in fact constructed atop a Turkish cultural center, amid protests by local residents. It was clearly more political than anything religious. It was clearly a "mine is bigger than yours" type of statement. In 2006, terror plots got exposed in Switzerland, leading to the arrest of a dozen people.

Posted from Diigo. The rest of my favorite links are here.