Saturday, May 8, 2010

टीवी मीडिया पर भरोसा कैसे होगा - how will we trust electronic media by punya prasoo - www.bhaskar.com

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    • पुण्य प्रसून वाजपे
    • राहुल न्यूज चैनलों के लिए ब्रांड हैं। ब्रांड की लाग-लपेट में चैनल अगर खो जाएं तो दर्शकों को सच कौन बताएगा। हुआ भी यही। राहुल गांधी ने गांधी के बराबर आंबेडकर को रखकर यह जतलाने का प्रयास किया कि कांग्रेस के सिर्फ गांधी नहीं हैं, और आंबेडकर सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के नहीं है। लेकिन, तात्कालिकता चैनलों की प्राथमिकता है तो इतिहास गायब है और किसी ने यह बताने की जुर्रत नहीं समझी कि महात्मा गांधी के साथ न देने की वजह से ही आंबेडकर ने 1936 में कहा था कि हिंदू धर्म में पैदा होना तो उनकी मजबूरी थी, लेकिन हिंदू धर्म में मौत न हो, इसकी व्यवस्था तो वह कर ही सकते हैं। तभी से दलित समाज के लोगों ने मान लिया था कि संघर्ष तो हिंदुत्व से है। असल में 16 जून,1934 में आंबेडकर की पहली मुलाकात गांधी से हुई। मुंबई में हुई इस मुलाकात में आंबेडकर ने गांधी के सामने यही सवाल रखा कि उन्हें अस्पृश्य समाज की मदद में सामाजिक-सांगठनिक और आर्थिक तौर पर आगे आना चाहिए, इसलिए हरिजन सेवक संघ को इसमें मदद करनी चाहिए। लेकिन गांधी ने मदद से सीधे इंकार कर दिया। आंबेडकर ने हर उस आधार को ध्वस्त किया, जिसमें हिंदुओं की मौजूदगी रही है।
    • कांग्रेस के तौर-तरीकों को लेकर आंबेडकर ने कभी गांधी का समर्थन नहीं किया। एक वक्त, जब आंबेडकर को लेकर यह कयास लगने लगे कि वह कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे तो आंबेडकर ने कांग्रेस को जलता हुआ घर कह कर कांग्रेसी सोच पर पानी डाल दिया।

      जाहिर है न्यूज चैनल अगर इस तरह से खबरों को पकड़ने लगें तो भागती-दौड़ती मीडिया की जिंदगी ठहरेगी। देखने वाले सोचेंगे। तब पत्रकारिता सरोकार वाली होगी।

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