Wednesday, September 9, 2009

नेपाल से खरी-खरी

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    • वेदप्रताप वैदिक
    Nepal
    • झा की हिंदी शपथ का विरोध करने वाले नेपाली हिंदी को भारत के वर्चस्व का प्रतीक मानते हैं। वे मानते हैं कि नेपाल के मधेसी हिंदी के बहाने भारत को हमारे सिर पर थोप रहे हैं।यह ठीक है कि नेपाल के मधेसी लोग घर में भोजपुरी, मैथिली, अवधी आदि बोलते हैं, लेकिन उनकी संपर्क और सामूहिक पहचान की भाषा हिंदी है। उनकी जनसंख्या नेपाल की आधी के बराबर है। इस बार संसद में भी उनका प्रतिनिधित्व जोरदार है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति भी मधेसी ही बने हैं।
    • हिंदी का सवाल हो या भारतीय पुजारियों का, भारत सरकार को भी दो-टूक राय रखनी चाहिए। उसे नेपाल सरकार व भारत-विरोधी तत्वों को बता देना चाहिए कि वे मर्यादा भंग न करें। यह नहीं हो सकता कि नेपाल को भारत 2000 करोड़ की आर्थिक सहायता भी दे और वहां वह भारत-विरोधी अभियानों को भी बर्दाश्त करता रहे। चीन और पाकिस्तान, भारत की इस नरमी का बेजा फायदा उठा रहे हैं। नेपाल अरबों-खरबों के नकली नोटों का अड्डा बनता जा रहा है और चीनी सरकार नेपाली फौज में भी घुसपैठ के रास्ते तलाश रही है। नेपाल में जो हो रहा है, वह भारत की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकता है। इसके अलावा दक्षिण एशिया के सबसे बड़ा राष्ट्र होने के नाते यह देखना भी उसका कर्तव्य है कि पड़ोसी देशों में कहीं गृहयुद्ध की खिचड़ी तो नहीं पक रही है। नेपाल की रक्षा और भारत की रक्षा अलग-अलग नहीं है। भारत पर प्रहार करके नेपाल स्वयं को सुरक्षित कैसे रख सकता है?

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