Saturday, February 6, 2010

Jagran - Yahoo! India - डा.अंबेडकर का विमर्श



    • यह भ्रम बना हुआ है कि डा. भीमराव अंबेडकर केवल दलित नेता थे। वह सदैव पूरे देश के लिए सोचते और काम करते रहे। निस्संदेह, आज बहुत से लोग अंबेडकर और दलितवाद के नाम पर ऐसी गतिविधियों में संलग्न हैं, जिससे अंबेडकर को घृणा होती। अंबेडकर ने बार-बार घोषित किया था कि भारतीय समाज की सबसे निम्न सीढ़ी के लोगों के लिए आर्थिक उत्थान से बड़ा प्रश्न उनके आत्मसम्मान, विवेक और आत्मनिर्भरता का है। आजकल अंबेडकर का नाम लेकर जब-तब 'बौद्ध दीक्षा समारोह' आयोजित होते हैं। इन आयोजनों में ईसाई मिशनरियों का बड़ा हाथ होता है। किंतु दलितों को बौद्ध धर्म में मतांतरित कराने में ईसाई नेताओं की क्या दिलचस्पी है? इसका जवाब 'क्राइस्ट व‌र्ल्ड' पत्रिका में है। इसमें लिखा है कि दलितों की मुक्ति के लिए ईसाई समाज ने इतना काम किया है कि दोनों के बीच एक संबंध विकसित हो गया है। इससे भविष्य में दलितों का ईसाई पंथ में मतांतरित हो जाना एक स्वभाविक संभावना है।
      मिशनरी संस्था 'गोस्पेल फार एशिया' के अनुसार पहले दलितों को केवल बौद्ध होने के लिए कहा गया। बदले में दलित नेताओं ने वादा किया कि वे अपने लोगों को ईसाई बनाने के लिए हमारे साथ काम करेंगे। इनमें यदि एक तिहाई भी बाद में ईसाई बन जाते हैं तो कितनी बड़ी संख्या में नए ईसाई होंगे! क्या इसीलिए डा. अंबेडकर बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए थे? उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अपने कार्य के लिए उन्हें विदेशी धन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि भारत को बाहरी मजहबों की कोई आवश्यकता नहीं है।

    • [एस शंकर: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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