Saturday, June 12, 2010

Jagran - Yahoo! India - नक्सलवाद से खुला युद्ध

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    • सलवा जुडूम आदिवासियों का अपना प्रतिरोध है, जो माओवादी मनमानी के विरुद्ध स्वत:स्फूर्त आरंभ हुआ। वे उन्हीं गांवों और जंगलों के निवासी हैं, जहां नक्सली जमे हुए हैं। नक्सली कमाडरों में आध्र और अन्य प्रातों के भी लोग हैं, जबकि सलवा जुडूम में विशुद्ध रूप से स्थानीय आदिवासी ही शामिल हैं। वे पूरे क्षेत्र और जन-गण को जानते हैं और सास्कृतिक रूप से उनके ही अंग हैं। इसीलिए उनके द्वारा नक्सलियों के विरुद्ध शस्त्र उठा लेना नक्सलवाद के खिलाफ सबसे घातक हमला है। इसीलिए माओवादी सलवा जुडूम से सबसे अधिक बौखलाते हैं।

      नक्सली निदान का मुख्य सूत्र यह है कि युद्ध खुलकर लड़ा जाए! यदि किसी गिरोह ने 'भारत राष्ट्र' या अरुंधति के शब्दों में 'हिंदू स्टेट' के विरुद्ध डंके की चोट पर युद्ध की घोषणा की है तो लड़ने के सिवा कोई विकल्प ही नहीं है! यही धर्म भी है। जो माओवादी सब्जबाग दिखाकर युवाओं को कथित क्राति-पथ पर लाते हैं, उनकी पोल खोलना जरूरी है। माओ के जीवन और कार्य की सच्चाई, माओवादी सत्ताओं के कारनामों से लोगों को परिचित कराना चाहिए। भारत में माओवादियों की नृशसता से तो लोग परिचित हैं, किंतु उनकी विचारधारा, राजनीतिक कार्यक्रम आदि पर लोगों को जागरूक करने का काम नहीं किया गया। जबकि माओवाद की विचारधारा ही वह चीज है, जिनसे नक्सली गुट अपनी मानसिक खुराक पाते हैं।

    • नक्सलवाद के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष प्रतिरक्षात्मक नहीं, आक्रामक रूप से चलाना चाहिए। अभी उलटा हो रहा है। सरकार उन नक्सल समर्थक बुद्धिजीवियों को ही जवाब नहीं दे पा रही है जो 'स्टेट टेररिज्म' के उलटे-सीधे आरोप लगाते हैं, या 'भूमि-सुधार' और 'वार्ता द्वारा समाधान' की कहानियां गढ़ते हैं। यह तो शत्रु के वाग्जाल में फंसना हुआ। प्रश्न तो नक्सली कार्यक्रमों पर उठना चाहिए कि किन तथ्यों, आंकड़ों, अनुभवों और नैतिक मूल्यों पर उन्हें बनाया गया है? बात-बात में स्तालिन और माओ को उद्धृत करने वाला कार्यक्रम कितना घातक है, चर्चा इस पर केंद्रित हो। यह बताया जाए कि न केवल दुनिया भर के गंभीर अध्येताओं, बल्कि स्वयं रूसियों और चीनियों ने भी स्तालिन व माओ को 'मानवता के सबसे बड़े अपराधी' की संज्ञा दी है।
    • एक थोपे गए युद्ध में जीतने के सिवा कोई विकल्प स्वीकार करना उचित नहीं। अपने आलोचकों से प्रशसा सुनने का बचकाना लोभ शासकों को छोड़ना चाहिए। सरकारी अकादमियों, विश्वविद्यालयों आदि में जमे कट्टरपंथियों के प्रति अतिशय उदारता भी बंद होनी चाहिए। बहुत से लोगों के लिए मानवाधिकार एक्टिविज्म एक लाभदायक धंधा बन गया है, जिससे वे विदेशी स्त्रोतों से सुख-सुविधा-पर्यटन पाते हैं। ऐसे मानवाधिकारवादियों की सरकारी समितियों, आयोगों आदि में नियुक्ति तत्काल बंद होनी चाहिए। अकादमिक स्वायत्तता को स्पष्ट परिभाषित करना चाहिए। सरकारी धन से ही सरकार के विरुद्ध विध्वंसकारी गतिविधियों के अड्डों के रूप में संस्थाओं का दुरुपयोग बंद होना चाहिए।

      [एस शंकर: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]


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