Wednesday, October 7, 2009

रूखसाना आपा से कम्युनिस्टों तक -तरुण विजय-कॉलम के सिपाही-विचार मंच-Navbharat Times

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    • तरुण विजय
    • जो चीन कुमार जीव की ज्ञान-परम्परा का आज भी ससम्मान उल्लेख करता है, वह भारत से शत्रुता क्यों निभा रहा है। काष्गर में उइगर सहित्यकार मिले तो उन्होंने बताया कम्यूनिस्ट चीन की सभ्यता और ज्ञान परम्परा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे आस्थाहीन राजनीतिक सत्ता की निर्ममता के वाहक है। इसलिये कुमार जीव का उल्लेख उन्हे अपने अतीत के इतिहास से सातत्य बनाए रखने का अवसर मात्र देता है। कुमार जीव के मूल देश से वे वैसे भी जुड़ना नहीं चाहते क्योंकि कुमार जीव उनके लिये चीनी विद्वान है। भारतीय नहीं। उइगर मूलतः पूर्वो तुर्किस्तानी हैं और गत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद चीनी प्रभुत्व में लाये गये। हालांकि चीन वहां अपना दावा कई शताब्दी पूर्व का बताता है। इसी क्षेत्र में मोर स्तूप और तुरपन की बौद्ध गुफायें ठीक अजन्ता की प्रतिकृतियां, आज भी विश्व भर से सैलानी आकृष्ट करती है। पर मुस्लिम बहुल होने के कारण यह क्षेत्र चीन के लिये आतंकवाद का सरदर्द भी बना है।
    • बीजिंग में एक वाक्य अक्सर सुनने को मिलता है - भारत और चीन दो विश्व की महान सभ्यतायें है, दोनों के बीच हजारों वर्श पुराने सम्बन्ध हैं। हजार वर्श में कोई झगड़ा नहीं हुआ। सिवाय एक 1962 में। सिर्फ उस एक घटना को हजार सालों पर क्यों छाने दें? मैंने प्रत्युत्तर में कहा था हजार साल इसलिये झगड़ा नहीं हुआ क्योंकि उन वर्षों में यहां कम्युनिस्ट नहीं थे। कम्युनिस्टों के आने के बाद ही युद्ध हुआ, पहले नहीं। वे चुप हो गये।
    • रुखसाना आपा हमारी नायक हैं। उनके बारे किसी भी प्रशंसा को अतिरंजना नहीं मानना चाहिये। सिंगल वुमन्स सलवा जुड़ुम बनी रुखसाना एक ऐसे समय में जब जम्मू कश्मीर में तिरंगे का अधिनायकत्व; 'जन-गन-मन-अधिनायक जय हे' सिकुड़ता दिखता है- रुखसाना हम सब की आपा बन गयी। जय हो।
    • ( लेखक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के डाइरेक्टर हैं)

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